अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई के सीनियर सलाहकार जवाद लारीजानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जान से मारने की धमकी देकर पूरी दुनिया को चौंका दिया है. उन्होंने कहा कि ऐसा हो सकता है, जब ट्रंप अपने लग्जरी हाउस मार-ए-लागो में धूप सेंक रहे हों, उसी समय उन्हें गोली लग जाए. ईरान इंटरनेशनल वेबसाइट के अनुसार, 'जब वह पेट के बल धूप में लेटते हों, तब एक छोटा सा ड्रोन उन पर हमला कर सकता है.लारीजानी को अयातुल्ला खामेनेई का करीबी माना जाता है.'
खामेनेई के करीबी का यह बयान ऐसे समय आया है जब ‘ब्लड पैक्ट’ नामक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म सामने आया है, जो खामेनेई का अपमान करने वालों और उनकी जान को खतरे में डालने वालों के खिलाफ 'बदले' के लिए फंड इकट्ठा कर रहा है. वेबसाइट का दावा है कि अब तक वह 27 मिलियन डॉलर से अधिक जमा कर चुकी है और उसका लक्ष्य 100 मिलियन डॉलर तक पहुंचना है. वेबसाइट पर प्रकाशित एक बयान में कहा गया है, 'हम उन लोगों को इनाम देंगे जो अल्लाह के दुश्मनों और खामेनेई की जान को खतरे में डालने वालों को न्याय दिलाएंगे.'
ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़ी फार्स न्यूज एजेंसी ने इस अभियान की शुरुआत की पुष्टि की है और धार्मिक समूहों से पश्चिमी देशों के दूतावासों और शहरों के केंद्रों में प्रदर्शन करने की अपील की है. साथ ही यह भी कहा गया कि ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर 'मोहेरेबेह' जैसे इस्लामी कानूनों को लागू किया जाना चाहिए. ईरानी कानून में ‘मोहेरेबेह’ यानी ‘अल्लाह के खिलाफ युद्ध’ एक गंभीर अपराध है जिसकी सजा मौत है.
ईरान सरकार ने बनाई दूरी
ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने अमेरिकी पत्रकार टकर कार्लसन से बातचीत में कहा कि यह ‘फतवा’ न तो सरकार का है और न ही खामेनेई का. लेकिन खामेनेई के अधीन चलने वाले ‘कायहान’ अखबार ने इस बयान को खारिज करते हुए लिखा, 'यह कोई अकादमिक राय नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का धार्मिक आदेश है.' अखबार ने चेतावनी दी कि भविष्य में अगर किसी ने ऐसी ‘चिंगारी’ भड़काई, तो उसका अंजाम खतरनाक होगा. लेख के अंत में लिखा गया – 'इस्लामिक रिपब्लिक इजरायल को खून में डुबो देगी.'
बिहार पुलिस न्यूज
बिहार के शेखपुरा से एक दरोगा की जाति के नाम पर बर्बरता और पुलिस वर्दी को शर्मसार करने का मामला सामने आया है. इस मामले में साडइ देने पर मेहुस थाना प्रभारी प्रवीण चंद्र दिवाकर इतना तमतमा गया कि ऑटो चालक को न केवल बेरहमी से पीटा, बल्कि उसकी जाति पूछकर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए सभी के सामने थूक चटवाया. किसी ने इस घटना को कैमरे में कैद कर लिया. सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही प्रशासन में हड़कंप मच गया.
विधायक ने उठाई गरीब ब्राह्मण की आवाज
शेखपुरा के मेहुस थाना प्रभारी के इस कुकृत्य की शिकायत मिलने पर क्षेत्रीय विधायक सुदर्शन कुमार ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि यह घटना न केवल जातीय द्वेष का प्रतीक है, बल्कि पुलिस तंत्र की क्रूरता का भी उदाहरण है. विधायक ने शेखपुरा एसपी से तत्काल कार्रवाई की मांग की, जिसके बाद आरोपी थानाध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया. थानाध्यक्ष प्रवीण चंद्र दिवाकर को शुरुआती जांच में दोषी पाया गया. वीडियो वायरल होने के बाद थानेदार की थू-थू हो रही है. लोग थानेदार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
क्या है पूरा मामला?
यह घटना शुक्रवार शाम करीब 7:30 बजे की है. टेंपो चालक प्रदुम्न कुमार रोज की तरह अपनी सवारी उतारकर घर लौट रहा था. इसी दौरान बुलेट बाइक पर सवार थाना प्रभारी प्रवीण चंद्र दिवाकर ने उसे ओवरटेक करने के लिए हॉर्न दिया. ऑटो साइड न देने पर नाराज थानाध्यक्ष ने रास्ते में ही उसे रोक लिया और गाली-गलौज करते हुए लाठियों से पीटना शुरू कर दिया. कुछ देर बाद उन्होंने अन्य पुलिसकर्मियों को भी बुलाया और युवक को थाने ले जाकर बेरहमी से पिटाई की.
पीड़ित प्रदुम्न कुमार ने अपने बयान में बताया कि पिटाई के दौरान थानाध्यक्ष ने उसकी जाति पूछी और जब उसने ब्राह्मण बताया, तो थाना प्रभारी ने कहा, “ब्राह्मण मेरा दुश्मन है.” इसके बाद उससे जमीन पर थूक चटवाया गया और माफीनामा लिखवाया गया.
थानेदार सस्पेंड, जांच के आदेश
घटना के सामने आते ही एसपी बलिराम चौधरी ने संज्ञान लेते हुए थानाध्यक्ष को तत्काल सस्पेंड कर लाइन हाजिर कर दिया. मामले की जांच शुरू कर दी गई है. एसपी ने कहा कि वीडियो की जांच की जा रही है और दोषी पाए जाने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी. फिलहाल इस अमानवीय घटना से थानेदार ती जातीय मानसिकता को भी सामने ला दिया है. मानवाधिकार आयोग और सामाजिक संगठनों ने भी इस घटना की निंदा की है.
बिहार चुनाव
क्या बिहार मतदाताओं का एक ऐसा वर्ग तैयार कर सकता है जो केवल जाति के आधार पर वोट न करे? क्या राज्य की जाति-आधारित राजनीति में कोई जाति-तटस्थ निर्वाचन क्षेत्र है या हो सकता है? क्या बिहार के मतदाता उन जातिगत सीमाओं को लांघने के लिए तैयार हैं? फिलहाल, इसका जवाब ये है कि बिहार के मतदाताओं के एक वर्ग में एक मंथन हो रहा है जो केवल जातिगत कारणों से किसी पार्टी से बंधे नहीं रहना चाहते.
ये मतदाता प्रदर्शन और ईमानदारी के आधार पर विकल्पों को तलाशना चाहते हैं. इस तरह के मतदाता सोच-समझकर मतदान करना पसंद करेंगे. इस से मतदान के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से पार्टियों को अपने उम्मीदवारों का चयन ज्यादा सावधानी से करने और अपने मुद्दों को ज्यादा जिम्मेदारी से व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर सकता है.
महिला मतदाता ट्रेंडसेटर्स
पिछले कई चुनावों में बिहारी महिला मतदाता सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय रही हैं। वह, जो अक्सर घर और खेतों की देखभाल के लिए पीछे छूट जाती हैं, जबकि पुरुष गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि दूरदराज के इलाकों में 'कमाई' के लिए चले जाते हैं, ने बड़ी संख्या में मतदान करके और कभी-कभी प्रचलित रुझान को बदलकर अपनी राजनीतिक कुशलता का प्रदर्शन किया है. बिहार की बदहाल राजनीति में, सबसे खूंखार बाहुबली भी अब अपने गुंडों पर लगाम लगाने को मजबूर हैं, कहीं ऐसा न हो कि इससे महिला मतदाता नाराज़ हो जाएं.
कुल संख्या के हिसाब से, बिहार में 7.64 करोड़ मतदाता हैं, जिनमें से 4 करोड़ पुरुष और 3.64 करोड़ महिलाएं हैं, लेकिन महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ रही है. 2020 के विधानसभा चुनावों में पंजीकृत कुल पुरुषों में पुरुष मतदाता 54.6 प्रतिशत थे जबकि महिला मतदाता 59.7 प्रतिशत थीं. 2015 में भी पुरुषों के लिए मतदान प्रतिशत 51.1 प्रतिशत और महिलाओं के लिए कहीं अधिक 60.4 प्रतिशत था.
यूथ फैक्टर
इनमें से लगभग 9 लाख 18-19 आयु वर्ग के हैं। ये युवा अपनी जातिगत पहचान से अनभिज्ञ नहीं हैं. इनमें से कई गर्व से अपने जातिगत इतिहास और ऐतिहासिक हस्तियों से 'जुड़ते' हैं. लेकिन वे अपने क्षेत्र के बेहतर विकास, अपने घरों के पास रोज़गार के अवसरों और एक उज्जवल भविष्य को लेकर भी चिंतित हैं. ये महत्वाकांक्षी युवा केवल उम्मीदवार की जाति से संतुष्ट नहीं हैं. भारत निर्वाचन आयोग का एक सर्वेक्षण भी इसकी पुष्टि करता है. केवल 4.2 प्रतिशत मतदाताओं ने केवल उम्मीदवार की जातिगत पृष्ठभूमि के आधार पर मतदान किया. कम से कम 32.2 प्रतिशत ने दावा किया कि उनकी जाति या पार्टी का कोई निश्चित विकल्प नहीं था. उन्होंने केवल उम्मीदवार के आधार पर ही निर्णय लिया.
जन सुराज प्रयोग
चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित राजनीतिक दल, जन सुराज, इस क्षेत्र में एक साहसिक और नया चेहरा है. उनकी पार्टी ने खुद को जाति-निरपेक्ष दिखाने की कोशिश की है और लोगों को जाति और समुदाय की वफादारी में फंसने के बजाय बुनियादी मानवीय सम्मान और नागरिक सुविधाओं की मांग करने के लिए प्रेरित किया है.
रूपौली भी एक पहेली है क्योंकि शंकर सिंह एक बाहुबली हैं जो एक स्थानीय मिलिशिया का नेतृत्व करते हैं। हालाँकि, उन्होंने स्थानीय कॉलेज, नदी तटीय क्षेत्रों में पुल और अन्य सुविधाओं का वादा किया। उनकी जीत यह भी दर्शाती है कि बिहार के चुनावी रणक्षेत्र में अभी भी सही रास्ते पर चलने के लिए ताकत की ज़रूरत है।
बदलाव ऊपर से आएगा या नीचे से
तेजस्वी यादव पिछले कुछ सालों से अपनी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं. वह पूर्व उप-मुख्यमंत्री हैं. चिराग पासवान अपने पिता द्वारा स्थापित पार्टी की पूरी कमान संभाल रहे हैं. नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार हाल ही में काफ़ी सक्रिय हुए हैं और जल्द ही पार्टी का नेतृत्व भी कर सकते हैं. इन तीनों के पास जाति-निष्ठ वोट बैंक है, जिस पर वे भरोसा कर सकते हैं, लेकिन क्या वे राज्य के मतदाताओं को एक उज्जवल भविष्य की ओर ले जाने का साहस और कल्पनाशीलता दिखाएंगे, जो ज़रूरी नहीं कि उनकी जातियों से ही परिभाषित हो?
श्रीकृष्ण सिंह
राजनीति में अक्सर नेता चुनाव प्रचार के दौरान वोट मांगने के लिए जनसभाओं और रैलियों में जाते हैं, लेकिन एक ऐसे मुख्यमंत्री भी हुए, जिनका अंदाज बिल्कुल अलग था. वे बिना भारी सिक्योरिटी के गांव-गांव, गली-मोहल्लों में निकल पड़ते, आम लोगों से सहजता से मिलते-जुलते, समस्याएं सुनते और समाधान का भरोसा देते. खास बात यह कि वे जनता से कभी सीधे तौर पर “वोट” नहीं मांगते थे, बल्कि जनता उनके व्यवहार और कामों से ही अपना निर्णय करती थी. जी हां! मैं, बात कर रहा हूं, बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह को लोग प्यार से 'श्री बाबू' कहते थे.
बिहार के 'शिल्पकार'थे श्री बाबू
श्रीकृष्ण सिंह आज भी बिहार केसरी के नाम से याद किया जाता है. श्रीकृष्ण सिंह को आधुनिक बिहार का शिल्पकार (आर्किटेक्ट) कहा जाता है. उनके दौर में बिहार में औद्योगिक विकास भी बड़े पैमाने पर हुआ. हालांकि, जिस क्षेत्र में उनके समय में औद्योगिक विकास को बढ़ावा दिया गया, वो अब झारखंड का हिस्सा है.
नहीं मांगते थे 'वोट'
जहां पर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, वहां के राजनेता चुनाव दौर में लोगों से वोट मांगते हैं, लेकिन श्रीकृष्ण बाबू बिहार में विधानसभा चुनाव के दौर में प्रत्याशियों के लिए तो क्या, अपने लिए भी वोट नहीं मांगते थे. वह कहते थे, 'पांच साल यदि हमने काम किया है, तो मुझे वोट मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर नहीं काम नहीं किया है, जनता उस लायक नहीं समझती है, तो मुझे वोट क्यों देगी?'
श्री बाबू 1946 में बिहार के पहले मुख्यमंत्री बने थे. वह 1961 तक इसी पद पर रहे. उनसे जुड़ा यह किस्सा साल 1957 का है, उस वक्त वह शेखपुरा जिले के बरबीघा से वह चुनाव लड़ रहे थे. उस दौरान उन्होंने अपने सहयोगियों से स्पष्ट कर दिया था कि इस चुनाव में वह जनता से वोट मांगने नहीं जाएंगे.
जमींदारी खत्म करने के बाद हुए थे लोकप्रिय
श्री बाबू के बारे एक बात और है, जो गांव और शहर के बुजुर्ग याद करते हुए सुनाते हैं. वो यह है कि श्रीकृष्ण सिंह अपने उसूलों से कभी कोई समझौता नहीं करते थे. इसके अलावा, बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म करने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है. प्रदेश के बुजुर्ग बुजुर्ग इस बात की भी चर्चा करते हैं कि जब वह सीएम थे तो कई बार अपने गांव भी जाते थे. उस वक्त वह अपने सुरक्षाकर्मियों को गांव के बाहर ही छोड़ देते थे. वह कहते थे कि यह मेरा गांव है. यहां मुझे कोई खतरा नहीं है. बिहार के लोग आज भी कहते हैं कि श्री बाबू कभी अपने क्षेत्र में वोट मांगने नहीं आते थे.
कौन थे श्रीकृष्ण सिंह?
बिहार के मुंगेर (अब शेखपुरा) जिलें में जन्में श्रीकृष्ण सिंह ने अपनी पढ़ाई लिखाई पटना से की. साल 1937 में श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पीएम बने. आजादी के बाद पहली बार हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी को 200 से अधिक सीटें मिली थी. इस बार मौका था बिहार के सीएम चुनने का. कांग्रेस के दो नेता आमने-सामने थे एक तरफ श्रीकृष्ण सिंह तो वहीं दूसरे तरफ अनुग्रह नारायण सिंह. श्रीकृष्ण सिंह भूमिहार जाति से थे तो अनुग्रह नारायण सिंह राजपूत जाति से. लेकिन सियासी लड़ाई में बाजी श्रीकृष्ण सिंह ने मारी. श्रीकृष्ण ने अपने कार्यकाल के दौरान बिहार से जमींदारी प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया. श्रीकृष्ण सिंह का देहांत साल 1961 में हुआ था.